भारतीय किसान यूनियन (अवधेश) ने एक बड़ा और सख्त निर्णय लेते हुए अपने कुछ पदाधिकारियों को संगठन से बाहर कर दिया है। यह कार्रवाई उन सदस्यों पर की गई है, जो लंबे समय से संगठन के कामकाज में रुचि नहीं ले रहे थे और लगातार निष्क्रिय बने हुए थे।
इस फैसले के बाद संगठन के भीतर हलचल तेज हो गई है और किसान समाज में भी इस पर चर्चा का दौर शुरू हो गया है।

कौन-कौन हुए बाहर?
मैनपुरी जनपद से जुड़े तीन प्रमुख नाम इस कार्रवाई की चपेट में आए हैं—
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अजीत एडवोकेट, जिला अध्यक्ष
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संजीव गुप्ता, जो व्यापार प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय सचिव थे
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रमेश चंद्र मानव, व्यापार प्रकोष्ठ के जिला उपाध्यक्ष
इन तीनों को भारतीय किसान यूनियन (अवधेश) की प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त कर दिया गया है।
क्या हैं आरोप?
संगठन की तरफ से साफ कहा गया है कि जब से ये लोग जुड़े थे, तब से लेकर अब तक उन्होंने संगठन के लिए कोई सार्थक काम नहीं किया।
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कोई नई भर्ती नहीं कराई – संगठन से जुड़े रहते हुए किसी नए पदाधिकारी को जोड़ने की कोशिश नहीं की।
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मीटिंग से दूरी – किसी भी बैठक में सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं लिया।
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आंदोलनों से परहेज़ – न धरना, न प्रदर्शन और न ही अनशन का नेतृत्व किया।
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निजी काम प्राथमिक – संगठन का काम छोड़कर केवल अपने व्यक्तिगत कार्यों में लगे रहे।
संगठन का मानना है कि ऐसे पदाधिकारी सिर्फ नाम के लिए जुड़े रहते हैं, जबकि असली जिम्मेदारी निभाने से बचते हैं।
‘अपनी समस्याएँ लेकर आते थे, संगठन की नहीं’
भारतीय किसान यूनियन (अवधेश) के नेताओं ने बताया कि ये पदाधिकारी बार-बार अपनी निजी समस्याएँ संगठन के सामने रखते थे। वे हर बार यही कहते कि “हमें यह दिक्कत है, हमें वह परेशानी है” लेकिन संगठन के लिए कभी मैदान में नहीं उतरे।
ऐसे में संगठन ने साफ कर दिया है कि अब केवल वही लोग रहेंगे जो सक्रिय रहेंगे और किसानों की आवाज़ बुलंद करेंगे।
संगठन की नीति: निष्क्रियों के लिए जगह नहीं
भारतीय किसान यूनियन (अवधेश) का मानना है कि संगठन किसानों के हित के लिए बना है। यदि कोई पदाधिकारी इस मकसद से हटकर सिर्फ पद की शोभा बनकर रह जाता है, तो उसे बाहर कर देना ही सही है।
संस्था की ओर से स्पष्ट संदेश दिया गया है:
👉 “हमारे संगठन में वही पदाधिकारी रहेंगे जो सक्रिय रहेंगे। बाकी को हम आज़ाद कर देंगे, ताकि वे अपनी समस्याएँ खुद देख सकें।”
क्या यह पहली बार हुआ है?
नहीं। किसान संगठनों में इस तरह की कार्रवाइयाँ पहले भी होती रही हैं।
उदाहरण के तौर पर, पिछले साल कई जिलों में उन पदाधिकारियों को हटाया गया था, जो आंदोलन के समय कभी धरना स्थल पर नहीं पहुंचे। किसान संगठनों का इतिहास बताता है कि जो भी निष्क्रिय रहता है, वह देर-सबेर बाहर कर दिया जाता है।
संगठन की मजबूती के लिए सख्त कदम ज़रूरी
किसी भी संगठन की ताकत उसके सक्रिय कार्यकर्ताओं से होती है। यदि कार्यकर्ता सिर्फ नाम के लिए जुड़े रहें, तो संगठन कमजोर हो जाता है।
मान लीजिए किसी गाँव में बिजली की समस्या है। यदि संगठन का पदाधिकारी गाँववालों को साथ लेकर बिजली विभाग तक आवाज़ ही नहीं उठाएगा, तो किसान संगठन से उम्मीद क्यों करेगा? यही कारण है कि यूनियन बार-बार अपने सदस्यों से सक्रिय रहने की अपील करती है।
संगठन की भावी रणनीति
भारतीय किसान यूनियन (अवधेश) अब ऐसे नए लोगों को जोड़ने की योजना बना रहा है जो जमीनी स्तर पर किसानों के लिए काम करें।
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हर जिले में सक्रिय कार्यकर्ताओं की पहचान होगी।
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मीटिंग और धरना-प्रदर्शन में शामिल होने वालों को जिम्मेदारी दी जाएगी।
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केवल वही लोग पद पाएंगे, जो किसान की समस्या को अपनी समस्या समझेंगे।
किसानों के बीच क्या चर्चा है?
ग्रामीण इलाकों में यह खबर तेजी से फैल गई है। किसान आपस में चर्चा कर रहे हैं कि संगठन ने सही कदम उठाया या नहीं।
कुछ किसानों का कहना है कि “जो लोग काम ही नहीं कर रहे थे, उन्हें हटाना सही है।”
वहीं, कुछ का मानना है कि शायद इन पदाधिकारियों को एक और मौका दिया जाना चाहिए था।
सस्पेंस: अगली बारी किसकी?
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या यह कार्रवाई (inactive padhadhikari hue bahar bhartiya kisan union avdhesh) यहीं रुक जाएगी या आगे और भी नाम सामने आएंगे?
संगठन के अंदर से खबरें आ रही हैं कि आने वाले समय में और भी निष्क्रिय सदस्यों पर गाज गिर सकती है। इसका मतलब है कि जो भी पदाधिकारी केवल कुर्सी का मज़ा ले रहा है, वह सतर्क हो जाए।